follow us on:

गन्ना को निपटाने में मुन्ना का कितना हाथ?

मप्र भाजपा की राजनीति में अन्ना, गन्ना और मुन्ना की जोडी एक जमाने में खूब चर्चित थी, लेकिन अब इस तिकडी में से दो अन्ना और गन्ना अब बेपटरी हो चुके हैं क्योंकि दोनों ब्राम्हण हैं. तिकडी के आखिरी हिस्से मुन्ना भी अब हासिये पर जाते दिखाई दे रहे हैं बल्कि अब खुद मुन्ना संदेह के घेरे में हैं.
आइये आपको इस तिकडी की दिलचस्प कहानी के किरदारों से मिलाते हैं. अन्ना यानि अनूप मिश्रा जो पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई के भांजे हैं. वे विधायक, सांसद और मंत्री रह चुके हैं गन्ना यानि डा. नरोत्तम मिश्रा अपने लकधक स्टाइल की वजह से अभा विद्यार्थी परिषद से होते हुए विधानसभा तक पहुंचे. और मुन्ना यानि नरेंद्र सिंह तोमर भी संघ और महल की छत्रछाया मे पलते हुए विधानसभा से होते हुए केंद्रीय मंत्रिमंडल तक पहुंचे और आजकल मप्र विधानसभा के अध्यक्ष हैं.
अन्ना, गन्ना और मुन्ना की राजनीतिक यात्रा लगभग एक साथ की है. कभी किसी का सितारा बुलंद तो कभी किसी का. तीनों की हसरत मप्र का मुख्यमंत्री बनने की रही लेकिन तीन दशक बाद भी पूरी नही हुई. वक्त का पहिया कुछ ऐसा घूमा कि अन्ना और गन्ना धीरे-धीरे हासिये पर धकेल दिए गए. संयोग से दोनों ब्राह्मण हैं और भाजपा हाईकमान की कथित ब्राह्मण विरोधी नीति के शिकार हो गए.
इस तिकडी में नसीब वाले निकले मुन्ना यानि नरेंद्र सिंह तोमर. नरेंद्र सिंह कम बोलने वाले नेता हैं इसलिए वे मान-अपमान का पान मौन होकर करते रहे हैं. केंद्र मे वे लंबे किसान आंदोलन के बावजूद शहादत से बच गए, धर्मेंद्र प्रधान की तरह उनको इस्तीफा नहीं देना पडा.जबकि बारी -बारी से अन्ना और गन्ना पहले चुनाव हारे फिर धीरे से उनके टिकट कट गए. भाजपा में ये आम धारणा है कि अन्ना और गन्ना पार्टी की ओबीसी राजनीति की भेंट चढ गए. अकेले नरेंद्र सिंह तोमर ने अपने आपको ओबीसी नेताओं की राजनीति से बचा लिया, बल्कि वे भाजपा की ब्राह्मण विरोधी राजनीति का औजार बन गए.
हाल में संपन्न दतिया विधानसभा उप चुनाव में पहले गन्ना यानि नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटा, फिर भितरघात के आरोप लगे. दुर्भाग्य से भाजपा चुनाव हार भी गई. यदि भाजपा न हारती तो अन्ना के नंबर बढ जाते. इसीलिए मौके का फायदा उठाकर विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने भाजपा का वोट बैंक समझे जाने वाले कुशवाह समाज के खिलाफ एक विवादास्पद बयान देकर उन्हे नाराज कर दिया. दतिया विधानसभा चुनाव में भाजपा की हार की एक वजह नरेंद्र तोमर का बयान भी माना जा रहा है.
खास बात ये है कि नरेंद्र सिंह तोमर ने उपचुनाव के नतीजे आने के अगले दिन ही कुशवाहा समाज से अपने बयान के लिए माफी मांग ली. पार्टी कार्यकर्ताओं का मानना है कि यदि मुन्ना यानि नरेंद्र सिंह तोमर ने मतदान से एक दिन पहले माफी मांग लेते तो शायद भाजपा उपचुनाव न हारती.
अब इन अटकलों का कोई सबूत तो नहीं है कि गन्ना यानि डा नरोत्तम मिश्रा को निबटाने की साजिश में सक्रिय भूमिका निभाई लेकिन पर्दे के पीछे रहकर. चूंकि पार्टी में नरेंद्र सिंह तोमर की छवि मितभाषी और गंभीर नेता ही है इसलिए उनकी इस भूमिका पर कोई भरोसा नहीं करेगा, लेकिन वे अपने ही हमराहियों के बीच संदिग्ध तो हो चुके हैं.वे उमा भारती, बाबूलाल गौर, शिवराज सिंह चौहान और अब डा मोहन यादव के साथ भी बेहतर तालमेल बनाने में कामयाब रहे.
उन्होंने राजनीति में आगे बढते रहने के लिए कभी दाएं -बांए नहीं देखा.मप्र में आज भी तोमर के पास अपने दो सांसद और दर्जन भर विधायक तो हैं ही.तोमर की प्रतिस्पर्धा शुरू से उसी महल के प्रमुख के साथ रही है जहाँ से कभी उन्हे प्राणवायु मिलती थी. यानि ज्योतिरादित्य सिंधिया ही उनके प्रतिद्वंदी हैं. अन्ना और गन्ना को तो वै रास्ते से हटा चुके हैं.
. अब देखना होगा कि तिकडी के इस अंतिम खिलाडी के साथ भाजपा हाईकमान क्या सलूक करता है? इन तीनों की जन्मकुंडली के लिए गूगल, ग्रोक और चेटजीपीटी पर सब भरा पडा है, इसलिए मैं विस्तार में नहीं गया लेकिन मैंने तीनों को अंकुरित होने से लेकर बरगद बनते और उजडते देखा है.तीनों फर्श से अर्स तक की यात्रा कर चुके हैं. तीनों में से दो तो बेपटरी हो चुके हैं, अकेले मुन्ना यानि नरेंद्र तोमर ने उम्मीद का दामन नहीं छोडा है. उन्हे लगता है कि वे ही मोहन यादव के स्वाभाविक उत्तराधिकारी हो सकते हैं.
@ राकेश अचल

Latest PDFs

Achleshwar Express 05 Oct

05/10/2026

Achleshwar Express 28 sep

28/09/2026

Achleshwar Express 21 sep

21/09/2026

Achleshwar Express 14 sep

14/09/2026

Achleshwar Express 07 sep

07/09/2026

Achleshwar Express 31 Aug

31/08/2026