ग्वालियर
क्या आपने कभी सुना है कि किसी थाने में थाना प्रभारी से ज्यादा दबदबा उनके ड्राइवर का हो? मेला यातायात थाने में आजकल कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिल रहा है। थाने में नए टीआई प्रबल यादव के कमान संभालने के बाद व्यवस्थाएं पटरी पर लाने की कोशिशें तो शुरू हुईं, लेकिन उनकी नाक के नीचे बैठा उनका ही ड्राइवर संदीप यादव (आरक्षक क्रमांक 1080) पूरी व्यवस्था को पलीता लगाने में जुटा है।
सूत्रों की मानें तो ड्राइवर संदीप यादव खुद को टीआई से कम नहीं समझता। थाने में किसकी ड्यूटी कहां लगेगी, किसे क्या काम करना है—यह फरमान साहब के बजाय ड्राइवर की ओर से जारी हो रहा है। आलम यह है कि जो आदेश टीआई ने दिए ही नहीं, वे आदेश भी ड्राइवर अपने नाम से कर्मचारियों पर थोप रहा है।
90% से ज्यादा स्टाफ में भारी असंतोष
ड्राइवर के इस तानाशाह रवैये और अमर्यादित भाषा-शैली से थाने का लगभग 90 से 95 फीसदी स्टाफ बेहद आहत और आक्रोशित है। स्टाफ का कहना है कि ड्राइवर संदीप यादव हर समय कर्मचारियों को अपनी उंगलियों पर नचाने और प्रताड़ित करने की फिराक में रहता है। मुंशियों तक को सरेआम हड़काना उसके रोजमर्रा के मिजाज में शामिल हो चुका है। थाने में सिर्फ दो-चार करीबी कर्मचारियों को छोड़कर पूरा अमला ड्राइवर की कार्यप्रणाली के खिलाफ एकजुट हो रहा है।
अवैध वसूली और मनमानी के आरोप
पुलिस महकमे के अंदरूनी सूत्रों का दावा है कि संदीप यादव न केवल प्रशासनिक व्यवस्था में टांग अड़ा रहा है, बल्कि अवैध वसूली के खेल में भी लिप्त है। टीआई प्रबल यादव जहां थाने को सुचारू और पारदर्शी तरीके से चलाने का प्रयास कर रहे हैं, वहीं उनका ड्राइवर उनके विश्वास का फायदा उठाकर अपनी समानांतर सरकार चला रहा है।
बड़ा सवाल:
क्या पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी मेला यातायात थाने में पनप रहे इस असंतोष का संज्ञान लेंगे और स्वेच्छाचारी ड्राइवर पर कोई कड़ी कार्रवाई करेंगे? या फिर मामला यूं ही दबा रहा तो थाने का अंदरूनी गुस्सा किसी बड़े विवाद या बगावत के रूप में बाहर आएगा?




















