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क्या cockrochभी पहुंच गए सुप्रीम कोर्ट? आखिर क्यों उठा यह सवाल?

भारत के सुप्रीम कोर्ट और भारत की संसद जंतर-मंतर के प्रदर्शनकारियो के सवाल पर सहोदर नजर आती हैं. सरकार इस मुद्दे पर संसद में बहस से बच रही है वहीँ सुप्रीमकोर्ट ने उस याचिका पर तत्काल सुनवाई से इनकार कर दिया, जिसमें cockrochजनता पार्टी (सीजेपी) के प्रदर्शनकारियों पर दिल्ली पुलिस की कार्रवाई का मुद्दा उठाया गया था.

धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग

यह प्रदर्शन परीक्षा के पेपर लीक के मामले में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग को लेकर किया गया था.मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने एक वकील की याचिका पर कहा, “अपना समय बर्बाद मत कीजिए और हमारा समय भी बर्बाद मत कीजिए.”
मैं बार एंड बेंच पर यकीन करता हूँ.इसी की रिपोर्ट के मुताबिक़, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच के सामने पेश हुए वकील ने मामले को अगले दिन सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने की मांग की.
मेरे खयाल से सुप्रीम कोर्ट ने वही किया जो उसे करना चाहिए. देश का कोई वकील माननीय सुप्रीमकोर्ट को इस मामले में डिक्टेट नहीं कर सकता. मुझे पता है कि ये cockroch जन्मे ही माननीय मुख्य न्यायाधीश के श्रीमुख से ही हैं. हमारे यहाँ जन्म के असंख्य स्रोत हैं. तमाम आख्यान हैं. कहीं आंसू से, कहीं पसीने से, कहीं कान से, कहीं भूमि से भी जन्म की घटननाएं दर्ज हैं. इसी फेहरिस्त में कोकरोच के जन्म की नयी कहानी जुड गई है.अब कोई,कैसे अपने ही बच्चों के खिलाफ या पक्ष में सुनवाई कर सकता है. ऐसे मामले किसी तीसरे पक्ष को ही सुनना चाहिए.

Cockrochesकी याचिका

दरअसल, 15 मई को भारत के सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत ने एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा था, “समाज में पहले से ही ऐसे परजीवी मौजूद हैं जो व्यवस्था पर हमला करते हैं. क्या आप भी उनके साथ जुड़ना चाहते हैं? कुछ युवा ऐसे हैं, जो रोज़गार नहीं मिलने और पेशे में जगह न बना पाने के कारण cockrochकी तरह हर जगह फैल जाते हैं.”
जस्टिस सूर्यकांत की इस टिप्पणी की बहुत आलोचना हुई. हालांकि इस आलोचना के बाद जस्टिस सूर्यकांत ने स्पष्टीकरण दिया और कहा था कि उनकी टिप्पणी को ग़लत तरीक़े से पेश किया गया है.बाद में स्पष्टीकरण देते हुए जस्टिस सूर्यकांत ने कहा था, “मुझे यह देखकर दुख हुआ कि मीडिया के एक वर्ग ने एक निरर्थक मामले की सुनवाई के दौरान की गई मेरी मौखिक टिप्पणियों को गलत तरीके से पेश किया. मैंने विशेष रूप से उन लोगों की आलोचना की थी, जिन्होंने फर्ज़ी और नकली डिग्रियों की मदद से बार कानूनी पेशे जैसे क्षेत्रों में प्रवेश किया है. ऐसे ही लोग मीडिया, सोशल मीडिया और अन्य सम्मानित पेशों में भी घुस आए हैं, इसलिए वे परजीवियों की तरह हैं.”


लेकिन कहते हैं कि बंदूक से निकली गोली और मुँह से निकली बोली कभी वापस नहीं लौटती. माननीय के मुँह से जन्मे कोकरोच संभवतः माननीय मुख्य न्यायाधीश के प्रति पिता जैसा आदर भाव रखते हैं और इसीलिए बार-बार माननीय अदालत से संरक्षण की अपेक्षा करते हैं किंतु उन्हे हर बार निराश होना पडता है.
वैसे भी सुप्रीमकोर्ट में न्यायधीशोओ के 6 पद खाली हैं. सुप्रीमकोर्ट को 38 जज चाहिए हैं 32 ही..सुप्रीमकोर्ट में रोजा सिंगल, डबल, ट्रिपल बैंचों के अलावा संवैधानिक बैंच रोजाना कम से कम डेढ दर्जन मामले सुनती हैं फिर भी काम नही निबटता. सर्वोच्च न्यायालय में इस समय लगभग 94,000 मामले लंबित हैं. नीचे से लेकर ऊपर तक लंबित मामले तो 5.6 करोड होंगे. ऐसे में हमारे मुख्य न्यायधीश जंतर-मंतर पर हुई बर्बरता के वीडियो देखने का समय कहाँ से निकाले?
मेरी मुख्य न्यायाधीश से पूरी सहानुभूति है. उन्हे काम बाढ को देखते हुए या तो जजों की संख्या बढवाना चाहिए या सरकार दूसरे विषयों की तरह न्याय प्रणाली को भी अडानी -अंबानी के साथ ही विदेशों के लिए खोल दे. क्या फर्क पडेगा, जब हमने शिक्षा, चिकित्सा और रक्षा के क्षेत्र विदेशियों के लिए खोल दिए हैं तो न्याय को खोलने में क्या हर्ज है? जंतर-मंतर पर जिसे कुटना, पिटना हो कुटे, पिटे. न्यायालय को इससे क्या?

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