कार्रवाई हादसे के बाद ही होगी या पहले भी जागेंगे जिम्मेदार? पुलिस और माइनिंग की निगरानी पर उठे सवाल
भिंड जिले से ग्वालियर की ओर आने वाली रेत के लिए महाराजपुरा और बिजौली क्षेत्र प्रमुख रास्तों में शामिल बताए जा रहे हैं। स्थानीय स्तर पर लगातार यह सवाल उठ रहा है कि यदि इन मार्गों से बड़ी संख्या में रेत से भरे वाहन शहर की ओर आ-जा रहे हैं, तो संबंधित पुलिस थानों और खनिज विभाग की निगरानी आखिर कहां है? सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन रास्तों से होकर भारी वाहन गुजरते हैं, वहां तैनात पुलिसकर्मियों और खनिज विभाग की टीम को अवैध परिवहन की भनक क्यों नहीं लगती? रेत से लदे वाहन कई बार पुलिस व्यवस्था की नजरों के सामने से गुजरते हैं, लेकिन कार्रवाई दिखाई नहीं देती। क्या जांच और निगरानी केवल किसी बड़े हादसे या शिकायत के बाद ही शुरू होगी? यदि परिवहन वैध है तो दस्तावेजों की जांच कर स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं की जाती और यदि अवैध है तो कार्रवाई क्यों नहीं होती? सवाल सिर्फ रेत का नहीं, बल्कि सड़क सुरक्षा, नियमों के पालन और जिम्मेदार विभागों की सक्रियता का है।
बिजौली थाना: थाने के सामने से गुजरती रेत, फिर भी निगरानी पर सवाल
बिजौली क्षेत्र से रेत परिवहन को लेकर स्थानीय स्तर पर सवाल उठ रहे हैं। रेत से भरे भारी वाहनों की आवाजाही यदि नियमित है तो पुलिस की पेट्रोलिंग और चेकिंग व्यवस्था पर सवाल स्वाभाविक है। थाना क्षेत्र से होकर गुजरने वाले वाहनों की जांच के लिए पुलिस के पास व्यवस्था है, ऐसे में यह जानना जरूरी है कि कितने वाहनों की जांच हुई और कितनों पर कार्रवाई की गई। यदि कोई वाहन वैध दस्तावेजों के साथ चल रहा है तो पुलिस और माइनिंग विभाग को यह स्थिति सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करनी चाहिए। वहीं यदि नियमों का उल्लंघन हो रहा है तो जिम्मेदारों पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही? थाना प्रभारी से लेकर वरिष्ठ अधिकारियों तक को इस मार्ग पर रेत परिवहन की वास्तविक स्थिति की समीक्षा करनी चाहिए। सवाल किसी व्यक्ति विशेष पर आरोप लगाने का नहीं, बल्कि व्यवस्था की पारदर्शिता का है। आखिर रेत से लदे वाहन लगातार गुजर रहे हैं तो निगरानी तंत्र उन्हें देख क्यों नहीं पा रहा?
महाराजपुरा थाना: शहर के प्रवेश मार्ग पर रेत, जिम्मेदारों की नजर कहां?
महाराजपुरा क्षेत्र ग्वालियर में प्रवेश करने वाले महत्वपूर्ण मार्गों में है। यहां से भारी वाहनों की आवाजाही को देखते हुए रेत परिवहन की निगरानी और दस्तावेजों की जांच बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। सवाल यह है कि यदि भिंड की ओर से आने वाले रेत से लदे वाहन इस मार्ग का इस्तेमाल कर रहे हैं, तो पुलिस और खनिज विभाग की संयुक्त कार्रवाई कितनी प्रभावी है? क्या नियमित चेकिंग होती है या फिर शिकायत आने का इंतजार किया जाता है? सड़क पर भारी और ओवरलोड वाहनों की आवाजाही हादसे का कारण बन सकती है। ऐसे में किसी घटना के बाद कार्रवाई करने से बेहतर है कि पहले ही व्यवस्था सक्रिय हो। महाराजपुरा थाना क्षेत्र में रेत परिवहन की निगरानी को लेकर संबंधित अधिकारियों को जवाब देना चाहिए कि कितने वाहनों की जांच की गई, कितने वैध पाए गए और कितनों के खिलाफ कार्रवाई हुई। यदि आंकड़े मौजूद हैं तो उन्हें सामने लाने में किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
माइनिंग विभाग की निगरानी पर सबसे बड़ा सवाल: रेत दिखती क्यों नहीं?
भिंड से ग्वालियर आने वाले रेत परिवहन की निगरानी की जिम्मेदारी केवल पुलिस की नहीं, खनिज विभाग की भी है। यदि बड़ी संख्या में रेत से भरे वाहन नियमित रूप से ग्वालियर पहुंच रहे हैं, तो माइनिंग विभाग को यह बताना चाहिए कि इन वाहनों की वैधता की जांच किस स्तर पर हो रही है। यदि सब कुछ नियमों के अनुसार है तो विभाग स्पष्ट करे कि परिवहन के लिए आवश्यक दस्तावेज और अनुमति मौजूद हैं। लेकिन यदि अवैध परिवहन हो रहा है और इसके बावजूद लंबे समय तक कार्रवाई नहीं होती, तो विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठना स्वाभाविक है। सबसे गंभीर सवाल संभावित मिलीभगत या संरक्षण का है, लेकिन ऐसे आरोपों की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकती है। इसलिए विभाग को रेत परिवहन वाले मार्गों पर अभियान चलाकर वास्तविक स्थिति सामने लानी चाहिए। कार्रवाई हादसे के बाद की खानापूर्ति न बने—इससे पहले ही निगरानी, जांच और जवाबदेही सुनिश्चित होनी चाहिए।




















