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जिनके आदर्श में हमने हीरे सी मजबूती देखी थी, उन सबके आदर्श हमेशा से ही कांच रहे हैं… और जिन सब का काम था सिंहासन से उत्तर पाने का, वह सब सिंहासन से पैसा लेकर नंगा नाच रहे हैं।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत केवल संसद, विधानसभा या न्यायालय नहीं होते, बल्कि वह कलम होती है जो सत्ता की आंखों में आंखें डालकर सवाल पूछती है। वह आवाज होती है जो जनता के दर्द को शासन के दरबार तक पहुंचाती है। लेकिन जब वही आवाज बिकने लगे, वही कलम झुकने लगे और वही चेहरे सत्ता की चौखट पर खड़े होकर तालियां बजाने लगें, तब लोकतंत्र कमजोर नहीं, बल्कि भीतर से खोखला होने लगता है।

आज सबसे बड़ा संकट यह नहीं है कि सत्ता शक्तिशाली हो गई है। सबसे बड़ा संकट यह है कि सत्ता से जवाब मांगने वाले ही उसके गुणगान में व्यस्त दिखाई देने लगे हैं। जिन लोगों का दायित्व था कि वे व्यवस्था की कमियां उजागर करें, भ्रष्टाचार पर सवाल उठाएं, जनता के अधिकारों की लड़ाई लड़ें, उनमें से कई लोग आज सत्ता की निकटता को ही अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मान बैठे हैं।जनता सब देख रही है। उसे यह भी दिखाई देता है कि कब किसी की आवाज अचानक धीमी पड़ जाती है, कब सवालों की जगह प्रशंसा लिखी जाने लगती है और कब जनहित की जगह निजी हित हावी हो जाते हैं। विश्वास एक दिन में नहीं बनता, लेकिन टूटने में एक पल भी नहीं लगता। इसलिए जो लोग अपने सिद्धांतों का सौदा करते हैं, वे शायद कुछ समय के लिए लाभ कमा लें, लेकिन इतिहास उन्हें कभी सम्मान की नजर से नहीं देखता।lसच्ची पत्रकारिता और सच्चा जनसंघर्ष सत्ता का विरोध करना नहीं, बल्कि सत्ता से जवाब मांगना है।

यदि सरकार अच्छा काम करे तो उसकी सराहना भी होनी चाहिए और यदि जनता के हितों की अनदेखी हो तो उसी मजबूती से सवाल भी उठने चाहिए। यही लोकतंत्र का धर्म है और यही पत्रकारिता का चरित्र।आज जरूरत उन चेहरों की नहीं जो हर बदलती हवा के साथ अपना रुख बदल लें। जरूरत उन लोगों की है जो सच के साथ खड़े रहने का साहस रखें, चाहे सामने कितना ही बड़ा सिंहासन क्यों न हो। क्योंकि सिंहासन स्थायी नहीं होते, लेकिन सिद्धांत और चरित्र पीढ़ियों तक याद रखे जाते हैं।जनता अब चेहरों से नहीं, चरित्र से पहचान करती है। वह जानती है कि कौन सच के साथ खड़ा है और कौन सुविधाओं के साथ। समय का न्याय सबसे कठोर होता है। वह हर मुखौटा उतार देता है और अंत में केवल वही लोग बचते हैं जिन्होंने अपने जमीर को बिकने नहीं दिया।

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