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ग्वालियर की दुर्दशा का असली जिम्मेदार कौन? अधिकारी नहीं, राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी सबसे बड़ा अपराध है

ग्वालियर की टूटी सड़कें, बदहाल नालियां, अव्यवस्थित ट्रैफिक, अतिक्रमण, जलभराव, गंदगी, अवैध निर्माण और वर्षों से अधूरे पड़े विकास कार्य किसी एक विभाग या एक अधिकारी की विफलता नहीं हैं। यह उस राजनीतिक व्यवस्था का परिणाम हैं, जिसने वर्षों तक जनता के नाम पर वोट तो लिए, लेकिन जवाबदेही से हमेशा दूरी बनाए रखी। हर बार शहर की बदहाली का ठीकरा अधिकारियों के सिर फोड़ दिया जाता है, जबकि सच यह है कि प्रशासन उसी सीमा तक काम कर सकता है, जहां तक उसे राजनीतिक समर्थन और स्पष्ट निर्णय लेने की स्वतंत्रता मिले। जब हर फैसले में राजनीतिक हस्तक्षेप हो, तब व्यवस्था मजबूत नहीं बल्कि कमजोर होती है।

ग्वालियर में जब भी कोई ईमानदार अधिकारी अवैध कब्जों पर कार्रवाई करता है, माफियाओं पर शिकंजा कसता है, नियमों का पालन कराने की कोशिश करता है या प्रभावशाली लोगों के खिलाफ कदम उठाता है, तब सबसे पहले राजनीतिक दबाव सामने आ जाता है। फोन चलते हैं, सिफारिशें होती हैं, विरोध शुरू हो जाता है और कई बार कार्रवाई बीच में ही ठंडी पड़ जाती है। इसके बाद वही नेता जनता के बीच जाकर प्रशासन को निकम्मा साबित करने का प्रयास करते हैं। यह दोहरी राजनीति शहर को लगातार पीछे धकेल रही है।

सच यह भी है कि अधिकारी आते हैं और चले जाते हैं, लेकिन जनप्रतिनिधि वर्षों तक उसी क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। यदि शहर में वर्षों से समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं तो सबसे पहले सवाल उन लोगों से पूछा जाना चाहिए जिन्हें जनता ने विकास का जिम्मा सौंपा था। चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे करने वाले नेता चुनाव जीतने के बाद विकास की समीक्षा कम और राजनीतिक समीकरण साधने में अधिक व्यस्त दिखाई देते हैं। जनता की समस्याएं केवल भाषणों का विषय बनकर रह जाती हैं।

यह कहना भी उचित नहीं होगा कि सभी अधिकारी निष्कलंक होते हैं, लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सत्य है कि अनेक अधिकारी पूरी निष्ठा और ईमानदारी से काम करना चाहते हैं। यदि उन्हें राजनीतिक संरक्षण के बजाय राजनीतिक हस्तक्षेप मिले, यदि नियमों के पालन के बजाय वोट बैंक की चिंता हावी हो जाए, तो प्रशासनिक व्यवस्था का प्रभाव कमजोर पड़ना स्वाभाविक है। ऐसे में केवल अधिकारियों को दोषी ठहराना वास्तविक जिम्मेदारों को बचाने जैसा है।

आज ग्वालियर की जनता को यह तय करना होगा कि वह केवल आश्वासनों पर विश्वास करेगी या जवाबदेही भी मांगेगी। लोकतंत्र में सबसे बड़ी ताकत जनता है और जनता का पहला सवाल अपने चुने हुए जनप्रतिनिधियों से होना चाहिए। आखिर वर्षों से विकास के नाम पर मिले बजट का क्या हुआ? अधूरे प्रोजेक्ट कब पूरे होंगे? हर बारिश में शहर क्यों डूब जाता है? अतिक्रमण बार-बार क्यों लौट आता है? इन सवालों का जवाब किसी कलेक्टर या नगर निगम आयुक्त से पहले उन नेताओं को देना चाहिए जो वर्षों से सत्ता और व्यवस्था का हिस्सा रहे हैं।

ग्वालियर को दोषारोपण की राजनीति नहीं, जवाबदेह नेतृत्व चाहिए। अधिकारियों को निष्पक्ष होकर काम करने की स्वतंत्रता मिले, प्रशासन पर अनावश्यक राजनीतिक दबाव समाप्त हो और जनप्रतिनिधि जनता के प्रति अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभाएं। जिस दिन राजनीति संरक्षण की जगह सुशासन का साथ देगी, उसी दिन ग्वालियर की तस्वीर भी बदलनी शुरू हो जाएगी। शहर की बदहाली का समाधान अधिकारियों को कठघरे में खड़ा करने से नहीं, बल्कि राजनीतिक जवाबदेही तय करने से निकलेगा। अब समय आ गया है कि जनता भी चेहरों से नहीं, काम से नेतृत्व का मूल्यांकन करे, क्योंकि ग्वालियर का भविष्य केवल नारों से नहीं, ईमानदार नीयत और जवाबदेह राजनीति से तय होगा।

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