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भारी पड़ेगा मानसून का रूठना

आदित्य सिन्हा। मानसून की महत्ता को इसी बात से समझ सकते हैं कि कहावतों में इसे ‘भारत का वास्तविक वित्त मंत्री’ कहा गया है। भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए मानसून की मेहरबानी बहुत मायने रखती है। चूंकि मानसून एक मौसमी परिघटना है, इसलिए उसकी दशा-दिशा भी कई जलवायविक पहलुओं पर निर्भर करती है। ऐसा ही एक पहलू है अल नीनो।

इस साल अल नीनो की आशंकाओं ने नीति-नियंताओं की चिंताएं बढ़ा दी हैं। यह बहुत स्वाभाविक भी है, क्योंकि कई प्रकार की अनिश्चितताओं से उपजी अस्थिरता में कमजोर मानसून वर्तमान स्थितियों को और बिगाड़ने का ही काम करेगा।

विश्व मौसम विज्ञान संगठन यानी डब्ल्यूएमओ के अनुसार जून से अगस्त 2026 के बीच अल नीनो के सक्रिय होने की आशंका 80 प्रतिशत तक है, जो नवंबर तक 90 प्रतिशत तक हो सकती है।

अमेरिकी मौसम विज्ञानियों का अनुमान है कि अल नीनो के वर्ष 2026-27 की पूरी सर्दियों तक बने रहने के 96 प्रतिशत तक आसार हैं, जबकि नवंबर से जनवरी के बीच इसके चरम रूप धारण करने की आशंका 63 प्रतिशत तक है। हालात यही संकेत करते हैं कि 1950 के बाद यह अल नीनो का सबसे प्रचंड असर होने जा रहा है।

यह किसी मौसमी अनुमान से अधिक रोजगार, खाद्य सुरक्षा, महंगाई और आर्थिक विकास दर पर मंडराते संकट की एक पूर्व चेतावनी है। इसकी अनदेखी करना बहुत भारी पड़ सकता है।

अल नीनो के पीछे के विज्ञान को समझें तो गर्म पानी को पश्चिमी प्रशांत महासागर की ओर धकेलने वाली ट्रेड विंड्स कुछ वर्षों के अंतराल पर कमजोर पड़ जाती हैं। इस स्थिति में वह गर्म पानी वापस पूर्व की ओर फैलता जाता है, जिससे वायुमंडल में ऊष्मा का एक विशाल भंडार उत्सर्जित होता है।

यही कारण है कि इतिहास के अब तक के सबसे गर्म साल आमतौर पर अल नीनो के वर्ष ही रहे हैं। पिछली बार वर्ष 2023-24 में इसके प्रचंड रूप ने ही वर्ष 2024 को वैश्विक तापमान के मामले में एक नया रिकार्ड बनाने की दिशा में उन्मुख किया था। यह गर्मी सिर्फ प्रशांत महासागर के ऊपर ही सिमटकर नहीं रहती। विज्ञान की भाषा में यह टेलीकनेक्शंस यानी दूरगामी मौसमी संबंधी परिघटना होती है, जो विश्व भर में वर्षा के रुझान को प्रभावित करती है।

इसका एक निश्चित असर भारत में वर्षा के लिए प्रमुख रूप से उत्तरदायी मानसून पर पड़ता है। इससे न केवल मानसूनी वर्षा में देरी होती है, बल्कि उसकी मात्रा भी संकुचित हो जाती है। इस तरह एक दूरस्थ महासागर में घटित होने वाली परिघटना घरेलू समस्या का रूप धारण कर लेती है।

भारत को फसल उत्पादन और जल स्रोतों को दोबारा भरने के लिए जितने पानी की आवश्यकता होती है, उसके करीब 70 प्रतिशत हिस्से की पूर्ति मानसून से होती है। भारतीय मौसम विभाग ने पहले ही मानसूनी वर्षा के दीर्घकालिक औसत के 92 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है, जो सामान्य से कम श्रेणी में आता है।

कमजोर मानसून के व्यापक दुष्प्रभाव देखने को मिलते हैं। इससे गर्मी और विकराल रूप धारण कर लेती है, जिससे श्रमिकों की उत्पादकता एवं समग्र उत्पादन प्रभावित होता है। कम बारिश से फसल उत्पादन पर असर से किसान की आमदनी घटती है तो आपूर्ति तंग होने से महंगाई बढ़ती है।

भारत दुनिया के उन देशों में से एक है, जहां महंगाई को मापने वाले सूचकांक में खाद्य उत्पादों की बड़ी भारी हिस्सेदारी (47.6 प्रतिशत) है। अप्रैल में पहले ही मुद्रास्फीति 4.2 प्रतिशत के स्तर पर पहंच चुकी थी और लगता है कि यह अभी और बढ़ सकती है।

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