क्या मध्य प्रदेश की राजनीति का एक युग खत्म होने जा रहा है? क्या कांग्रेस अपने सबसे अनुभवी रणनीतिकार को खो देगी?
मध्य प्रदेश की राजनीति में कुछ नाम ऐसे हैं, जिनका जिक्र किए बिना प्रदेश का राजनीतिक इतिहास अधूरा माना जाता है। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ऐसा ही एक नाम हैं। करीब पांच दशक तक सत्ता के गलियारों से लेकर संगठन की रणनीति तक अपनी मजबूत पकड़ रखने वाले दिग्विजय सिंह ने अब सक्रिय राजनीति से दूरी बनाने के संकेत देकर सियासी गलियारों में नई बहस छेड़ दी है।
80 वर्ष की उम्र में उन्होंने कहा कि अब नई पीढ़ी को आगे आना चाहिए, वे पार्टी नेतृत्व से भी यह बात कह चुके हैं और अब उनका शेष जीवन धर्म रक्षा तथा धार्मिक यात्राओं के लिए समर्पित रहेगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अब न वे राजनीति करेंगे, न मंचों से भाषण देंगे और न ही सोशल मीडिया पर सक्रिय रहेंगे अगर यह फैसला अंतिम साबित होता है, तो यह सिर्फ एक नेता का राजनीतिक विराम नहीं होगा, बल्कि मध्य प्रदेश की राजनीति के सबसे लंबे और प्रभावशाली अध्यायों में से एक का समापन माना जाएगा।
1993 से 2003 तक लगातार दो कार्यकाल मुख्यमंत्री रहने वाले दिग्विजय सिंह ने प्रदेश की राजनीति को नई दिशा दी। सत्ता जाने के बाद भी उनका राजनीतिक प्रभाव कभी कम नहीं हुआ। कांग्रेस संगठन में उनकी भूमिका लगातार अहम रही। चुनावी रणनीति हो, संगठन की मजबूती हो या राष्ट्रीय स्तर की राजनीतिक लड़ाई—हर मोर्चे पर दिग्विजय सिंह पार्टी के सबसे भरोसेमंद चेहरों में शामिल रहे।दिग्विजय सिंह का राजनीतिक सफर जितना लंबा रहा, उतना ही विवादों से भी घिरा रहा।
उनके कई बयान राष्ट्रीय बहस का विषय बने। विरोधियों ने उन्हें निशाने पर रखा, लेकिन उन्होंने कभी अपने विचारों से पीछे हटने की राजनीति नहीं की। यही कारण है कि समर्थक उन्हें बेबाक नेता मानते हैं, जबकि विरोधी उन्हें कांग्रेस का सबसे विवादित चेहरा बताते रहे। इसके बावजूद एक सच यह भी है कि दिग्विजय सिंह ने हर दौर में खुद को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में बनाए रखा अब सबसे बड़ा सवाल कांग्रेस के भविष्य को लेकर है।
क्या दिग्विजय सिंह की सक्रिय राजनीति से दूरी पार्टी के लिए नुकसान साबित होगी? क्या मध्य प्रदेश कांग्रेस में ऐसा कोई चेहरा तैयार है जो उनके अनुभव, संगठन क्षमता और राजनीतिक समझ की भरपाई कर सके? या फिर दिग्विजय सिंह पद से दूर रहकर भी पर्दे के पीछे रणनीति बनाते रहेंगे भारतीय राजनीति में कई ऐसे नेता हुए हैं जिन्होंने चुनावी राजनीति से दूरी बनाई, लेकिन संगठन और निर्णयों पर उनका प्रभाव वर्षों तक बना रहा।
ऐसे में यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि ‘दिग्गी राजा’ पूरी तरह सियासत से विदा ले रहे हैं। हो सकता है वे मंच से दूर हों, लेकिन राजनीतिक बिसात पर उनकी मौजूदगी पहले की तरह महसूस होती रहे दिग्विजय सिंह का यह बयान सिर्फ उनका निजी फैसला नहीं, बल्कि कांग्रेस और मध्य प्रदेश की राजनीति के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ है।
अब देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह वास्तव में सियासत से संन्यास है, या फिर एक अनुभवी खिलाड़ी की नई राजनीतिक भूमिका की शुरुआत। इतना तय है कि अगर ‘दिग्गी राजा’ सक्रिय राजनीति से हटते हैं, तो मध्य प्रदेश की राजनीति का एक ऐसा अध्याय समाप्त होगा, जिसे आने वाले वर्षों तक याद किया जाएगा।













