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चीनी एक्सपर्ट ईरान समझौते को अमेरिका की हार और अपने देश की जीत क्यों बता रहे हैं?

चीन में एक्सपर्ट्स ने चेतावनी दी है कि अमेरिका-ईरान युद्धविराम समझौते को स्थाई शांति की दिशा में बड़ा कदम बताकर पेश नहीं किया जाना चाहिए. उनका कहना है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम और इसराइल-हिज़्बुल्लाह संघर्ष जैसे मुद्दों पर दोनों देशों के बीच अब भी बड़े मतभेद बने हुए हैं.

हालाँकि टिप्पणीकारों का यह भी कहना है कि चीन के “शांतिपूर्ण रुख़” वाले मॉडल और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ी रणनीति को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक मान्यता मिल रही है. उनके अनुसार इस संघर्ष ने ताइवान को लेकर अमेरिका के विरोध की क्षमता को भी कमजोर किया है. हालांकि चीनी सरकार ने अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौता ज्ञापन (एमओयू) का स्वागत किया है, लेकिन चीनी विश्लेषकों ने बातचीत की संभावनाओं को लेकर अधिक सतर्क रुख़ अपनाया है. 15 जून को चीनी अख़बार ग्लोबल टाइम्स में लिखे एक लेख में वांग जिन ने अमेरिका-ईरान समझौते को लेकर “सतर्क दृष्टिकोण” अपनाने की सलाह दी. वांग चीन की नॉर्थ-वेस्ट यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर हैं.

उन्होंने कहा कि होर्मुज़ स्ट्रेट को दोबारा खोलने की प्रक्रिया, ईरान के परमाणु कार्यक्रम और लेबनान में इसराइल की जारी सैन्य कार्रवाई जैसे मुद्दों पर दोनों पक्षों के बीच मतभेद बने हुए हैं. इसी वजह से यह समझौता अभी भी अनिश्चितताओं और अस्थिरता से घिरा हुआ है. 16 जून को अर्ध-सरकारी समाचार मंच ग्वांचु पर लिखते हुए प्रभावशाली टिप्पणीकार चेयरमैन रैबीट ने कहा कि आगे की बातचीत के लिए तय 60 दिनों की समयसीमा बहुत कम है. उन्होंने इसकी तुलना ज्वाइंट कंप्रिहेंसिव प्लान ऑफ़ एक्शन (जेसीपीओए) से की, जिसके लिए तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में क़रीब 20 महीने तक बातचीत चली थी.

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