ग्वालियर ग्रामीण का एक युवा नेता शायद राजनीति की उस गलती को दोहरा बैठा है, जिसका असर तत्काल दिखाई नहीं देता, लेकिन आने वाले समय में इसकी कीमत जरूर चुकानी पड़ सकती है।राजनीति में जोश जरूरी है, लेकिन जोश के साथ यह समझना भी जरूरी है कि किस मुद्दे पर बोलना है, किसके सामने बोलना है और किस समय बोलना है। ग्वालियर ग्रामीण की राजनीति में इन दिनों सोशल मीडिया की सक्रियता को ही राजनीतिक ताकत मान लेने का चलन बढ़ता दिखाई दे रहा है। पोस्ट, बयान और वायरल होने की कोशिशें कुछ समय के लिए चर्चा जरूर दिला सकती हैं, लेकिन राजनीति का असली मूल्यांकन जमीन पर काम और संगठन के भीतर स्वीकार्यता से होता है।युवा नेता ने जिस जगह पंगा लिया है, वह शायद सामान्य राजनीतिक टकराव नहीं है। आज भले ही इसे सोशल मीडिया की एक घटना मानकर नजरअंदाज कर दिया जाए, लेकिन राजनीति में याददाश्त लंबी होती है। आने वाले समय में जब संगठन जिम्मेदारियां बांटेगा, तब सिर्फ समर्थकों की भीड़ या सोशल मीडिया की सक्रियता नहीं, बल्कि राजनीतिक परिपक्वता भी देखी जाएगी।सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह रणनीति सोची-समझी थी या फिर हवा-हवाई राजनीति के जोश में उठाया गया कदम?भविष्य में बड़ी जिम्मेदारी मिलेगी या नहीं, यह तो समय तय करेगा, लेकिन इतना जरूर है कि गलत जगह लिया गया पंगा आने वाली राजनीति में घातक साबित हो सकता है। सोशल मीडिया पर कुछ घंटे की सुर्खियां मिल सकती हैं, मगर संगठनात्मक राजनीति में भरोसा बनाने में वर्षों लगते हैं।ग्वालियर ग्रामीण की राजनीति में अब देखना यही है युवा नेता इस गलती से सबक लेता है या सोशल मीडिया की तालियों को ही अपनी राजनीतिक ताकत समझता रहता है।



















