बिहार की कानून-व्यवस्था एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। भोजपुर जिले के शाहपुर
थाना क्षेत्र के बेलौटी गांव में पुलिसिया इकबाल को बुलंद करने के नाम पर एक और युवक की जिंदगी को सरकारी गोलियों से भून दिया गया। भरत भूषण तिवारी नामक जिस युवक को पुलिस ने ‘मुठभेड़’ में मार गिराने का दावा किया है, उसकी कहानी, चश्मदीदों के बयान और खुद पुलिस की हड़बड़ाहट चीख-चीख कर इसे एक सोची-समझी प्रशासनिक हत्या करार दे रहे हैं। यह सिर्फ एक युवक की मौत नहीं है, बल्कि यह न्याय की अवधारणा, मानवाधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों का सरेआम एनकाउंटर है।

जनहित की आवाज, वंचितों का हक और पुलिस की रंजिश
भरत तिवारी कोई आदतन अपराधी या समाज के लिए खतरा नहीं था। वह अपने इलाके में जनता के हक की आवाज बुलंद करने वाला एक सक्रिय युवक था। भरत के जन-कल्याण के कार्यों की फेहरिस्त बहुत लंबी थी, लेकिन उसका सबसे बड़ा और हालिया संघर्ष समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े लोगों के लिए था।
बाढ़ की विभीषिका के कारण विस्थापित हुए अत्यंत पिछड़ी जाति के सैकड़ों गरीब परिवारों को जब गांव के पास एक सरकारी नाले और खड्डे (लो-लाइंग एरिया) के किनारे अस्थायी रूप से बसा दिया गया, तो प्रशासन ने उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया। इन बदहाल लोगों के दर्द को भरत ने अपना दर्द बनाया। उसने अधिकारियों से लड़कर उस विस्थापित बस्ती में पानी और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएं पहुंचवाई। उसका अंतिम और सबसे बड़ा संघर्ष यह था कि वह उस खड्डे में बसी बस्ती में प्रशासनिक स्तर पर मिट्टी भराने (लैंड फिलिंग) की लगातार मांग कर रहा था, ताकि आने वाले मॉनसून में ये गरीब और पिछड़ी जाति के लोग दोबारा बाढ़ का शिकार होकर डूब न जाएं।













