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दतिया की दो तस्वीरें क्या चुनावी दुश्मनी सिर्फ मंच तक सीमित है?

दतिया विधानसभा उपचुनाव ने इस बार सिर्फ राजनीतिक भाषणों से नहीं, बल्कि दो तस्वीरों से पूरे मध्य प्रदेश की राजनीति में बहस छेड़ दी है। पहली तस्वीर वंदे भारत ट्रेन की है, जहाँ भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल और कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी आमने-सामने बैठकर सहज बातचीत करते दिखाई दिए। दूसरी तस्वीर में भाजपा प्रत्याशी आशुतोष तिवारी (कई जगह नाम आशीष भी लिखा गया, लेकिन आधिकारिक रूप से आशुतोष तिवारी) चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी से मुस्कुराकर मिलते और गले मिलते नजर आए।

इन दोनों तस्वीरों ने सोशल मीडिया पर सवालों की बाढ़ ला दी। सवाल सिर्फ इतना नहीं कि नेता मिले क्यों। लोकतंत्र में राजनीतिक विरोधियों का मिलना कोई अपराध नहीं है। असली सवाल यह है कि यदि मंच से एक-दूसरे को भ्रष्ट, झूठा, प्रदेश का दुश्मन और जनता का गुनहगार बताया जाता है, तो कैमरे से इतर इतनी आत्मीयता क्यों दिखाई देती है?हर चुनाव में जनता को यही बताया जाता है कि सामने वाली पार्टी प्रदेश को बर्बाद कर देगी। सभाओं में शब्दों के तीर चलते हैं, आरोपों की आग लगाई जाती है, कार्यकर्ता सड़कों पर भिड़ते हैं और समर्थकों के बीच नफरत की खाई चौड़ी होती जाती है। लेकिन जैसे ही मंच खत्म होता है, वही नेता ट्रेन में साथ बैठकर मुस्कुराते हैं, हाथ मिलाते हैं और गले लगते दिखाई देते हैं। ऐसे दृश्य आम मतदाता के मन में सवाल पैदा करते हैं कि क्या राजनीतिक लड़ाई सिर्फ जनता के सामने दिखाई जाने वाली पटकथा है?यह खबर किसी नेता के मिलने का विरोध नहीं करता। बल्कि लोकतांत्रिक शिष्टाचार का सम्मान करता है। लेकिन राजनीति की सबसे बड़ी पूंजी जनता का विश्वास है। यदि नेता चुनावी मंच पर एक-दूसरे को देश और प्रदेश का सबसे बड़ा खतरा बताएं और अगले ही पल आत्मीयता से मिलते दिखें, तो जनता के मन में संदेह पैदा होना स्वाभाविक है।

दतिया की इन दो तस्वीरों ने एक बार फिर यह एहसास कराया है कि चुनाव में सबसे अधिक भावनात्मक निवेश कार्यकर्ता और मतदाता करते हैं। वे रिश्ते बिगाड़ लेते हैं, बहसों में उलझ जाते हैं, परिवारों तक में राजनीतिक विभाजन हो जाता है। दूसरी ओर, शीर्ष नेतृत्व अक्सर व्यक्तिगत संबंधों को सहज बनाए रखता है।

राजनीति में व्यक्तिगत सौहार्द गलत नहीं, लेकिन चुनावी भाषणों और व्यवहार के बीच इतना बड़ा अंतर लोकतंत्र की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न जरूर लगाता है।दतिया का उपचुनाव सिर्फ एक सीट का चुनाव नहीं रह गया है। यह जनता की राजनीतिक समझ की भी परीक्षा है। मतदाता अब तस्वीरें भी देख रहा है और भाषण भी सुन रहा है।

वह यह भी समझ रहा है कि चुनावी नारों और वास्तविक राजनीतिक रिश्तों में कितना अंतर है।आख़िरकार लोकतंत्र में जनता को यह अधिकार है कि वह सवाल पूछे क्या चुनावी कटुता वास्तविक है या केवल वोटों की रणनीति? क्या मंच पर दिखाई देने वाली दुश्मनी और मंच के बाहर दिखाई देने वाली दोस्ती के बीच कहीं जनता ही तो सबसे बड़ा मोहरा नहीं बन रही दतिया की ये दो तस्वीरें शायद आने वाले समय में भुला दी जाएँगी, लेकिन इन्होंने एक ऐसा सवाल छोड़ दिया है जिसका जवाब केवल भाजपा या कांग्रेस को नहीं, बल्कि पूरे राजनीतिक तंत्र को देना होगा क्या चुनाव विचारधारा की लड़ाई है, या सिर्फ सत्ता तक पहुँचने का अभिनय?

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