लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसका निष्पक्ष प्रशासन होता है। लेकिन जब आम लोगों के बीच यह धारणा बनने लगे कि सरकारी तंत्र कानून से अधिक सत्ता के इशारों पर चल रहा है, तब यह केवल राजनीतिक बहस का विषय नहीं रह जाता, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का संकेत बन जाता है।मध्य प्रदेश में पिछले कुछ समय से कई ऐसे घटनाक्रम सामने आए हैं, जिन्होंने प्रशासन की निष्पक्षता पर सवाल खड़े किए हैं।
विपक्ष लगातार आरोप लगाता रहा है कि अधिकारी जनता के प्रति अपनी जवाबदेही निभाने के बजाय सत्ता के दबाव या राजनीतिक संकेतों के अनुसार फैसले ले रहे हैं। दूसरी ओर सरकार इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहती है कि पूरा प्रशासन कानून और नियमों के अनुसार काम कर रहा है लेकिन असली सवाल सरकार या विपक्ष का नहीं है। असली सवाल जनता का है।यदि किसी जिले में शिकायतों पर कार्रवाई राजनीतिक पहचान देखकर होती हुई दिखाई दे, यदि भ्रष्टाचार की फाइलें वर्षों तक धूल खाती रहें और सत्ता से जुड़े मामलों में तेजी दिखाई दे, यदि आम नागरिक को अपने ही अधिकारों के लिए दफ्तर-दफ्तर भटकना पड़े, तो स्वाभाविक रूप से प्रशासन की निष्पक्षता पर प्रश्न उठते हैं।
लोकतंत्र में सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन प्रशासनिक व्यवस्था स्थायी होती है। इसलिए अधिकारियों की पहली और अंतिम निष्ठा संविधान, कानून और जनता के प्रति होनी चाहिए, न कि किसी राजनीतिक दल या व्यक्ति के प्रति। यही भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था की मूल भावना भी है।इतिहास गवाह है कि सत्ता कभी स्थायी नहीं होती। जो अधिकारी किसी एक दौर में राजनीतिक दबाव के आगे झुकते हैं, वही अधिकारी सत्ता परिवर्तन के बाद सबसे पहले जांच और जवाबदेही के घेरे में भी आते हैं। इसलिए अल्पकालिक राजनीतिक सुविधा, दीर्घकालिक प्रशासनिक विश्वसनीयता की कीमत पर नहीं होनी चाहिए आज आवश्यकता इस बात की है कि मध्य प्रदेश का प्रशासन केवल निष्पक्ष हो ही नहीं, बल्कि जनता को निष्पक्ष दिखाई भी दे। क्योंकि न्याय केवल होना पर्याप्त नहीं है, न्याय होते हुए दिखाई देना भी उतना ही आवश्यक है लोकतंत्र की मजबूती सत्ता से नहीं, बल्कि मजबूत और निष्पक्ष संस्थाओं से होती है। यदि सिस्टम पर जनता का भरोसा कमजोर पड़ने लगे, तो यह किसी भी सरकार के लिए सबसे बड़ी चेतावनी है।सवाल केवल इतना है क्या प्रशासन सचमुच कानून के अनुसार चल रहा है, या फिर सत्ता की परछाई इतनी गहरी हो चुकी है कि सिस्टम की निष्पक्षता पर उठते सवाल अब जनता की आवाज बन चुके हैं?

















