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धरना किसी का भी हो, सड़क पर आख़िरी फैसला पुलिस का ही चलता है

सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, बड़ा नेता हो या नया युवा चेहरा, मंच पर भाषण देने वालों की आवाज़ चाहे कितनी भी बुलंद क्यों न हो, लेकिन सड़क पर कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी पुलिस के हाथ में होती है। यही वजह है कि देशभर में चल रहे धरना-प्रदर्शनों के दौरान एक तस्वीर बार-बार सामने आती है नेता नारे लगाते हैं,

समर्थक जोश

समर्थक जोश दिखाते हैं और हालात बिगड़ते ही पुलिस मोर्चा संभाल लेती है।प्रदर्शन में शामिल होने से पहले युवाओं को यह समझना होगा कि राजनीति का जोश और कानून की सीमा दो अलग-अलग बातें हैं। मंच पर तालियां मिल सकती हैं, लेकिन कानून का उल्लंघन होने पर कार्रवाई भी हो सकती है। पुलिस के लिए यह मायने नहीं रखता कि सामने सत्ता पक्ष का कार्यकर्ता है या विपक्ष का नेता। जब व्यवस्था बिगड़ने का खतरा होता है, तो कार्रवाई सभी पर समान रूप से हो सकती है राजनीतिक दल अक्सर अपने कार्यकर्ताओं के जोश को अपनी ताकत बताते हैं,

लेकिन किसी भी प्रदर्शन में सबसे बड़ा जोखिम वही कार्यकर्ता उठाते हैं जो सबसे आगे खड़े होते हैं। बड़े नेता आगे बढ़कर भाषण देते हैं, लेकिन कानून-व्यवस्था संभालने के समय पुलिस का सामना सबसे पहले प्रदर्शनकारियों को ही करना पड़ता है।युवा नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए यह समय भावनाओं से नहीं, समझदारी से काम लेने का है। लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखना हर नागरिक का अधिकार है, लेकिन कानून का सम्मान करना भी उतना ही जरूरी है। किसी के बहकावे में आकर ऐसा कदम न उठाएं जिससे भविष्य पर दाग लग जाए।

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24/08/2026