
ग्वालियर। मध्यप्रदेश शासन के मुख्यमंत्री जन-विश्वास अभियान-2026 के तहत गुरुवार को ग्राम पंचायत उटिला के स्कूल प्रांगण में शिविर आयोजित किया गया। इस शिविर में उटिला सहित बंधौली, बहांगी खुर्द, आरौली, टांकोली, टिहौली, भटपुरा सानी, काशीपुर और बड़ेरा ग्राम पंचायतों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी अपेक्षित थी। लेकिन शिविर के दौरान एक ऐसा दृश्य सामने आया जिसने महिला सशक्तिकरण और पंचायत व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, सरपंच के स्थान पर उनके पति सरपंच की कुर्सी पर बैठकर कार्यवाही में शामिल दिखाई दिए, जबकि निर्वाचित महिला सरपंच मौजूद नहीं थीं।पंचायती राज व्यवस्था का उद्देश्य महिलाओं को नेतृत्व का अवसर देना है। इसी सोच के तहत पंचायतों में महिलाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई, ताकि वे स्वयं निर्णय लें, योजनाओं की निगरानी करें और जनता के प्रति जवाबदेह रहें। यदि निर्वाचित प्रतिनिधि की जगह उसका पति बैठकर अधिकारों का उपयोग करता है, तो यह व्यवस्था की मूल भावना पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।मध्यप्रदेश सरकार लगातार महिला सशक्तिकरण, नारी सम्मान और महिलाओं की नेतृत्व क्षमता को बढ़ावा देने की बात करती है।
ऐसे में यदि किसी पंचायत में निर्वाचित महिला सरपंच की जगह उनके पति ही बैठकर पंचायत चलाते दिखाई दें, तो यह न केवल शासन की मंशा के विपरीत है बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की गरिमा पर भी सवाल उठाता है।ग्वालियर कलेक्टर द्वारा पूर्व में नगरीय निकायों में पार्षद पतियों की दखलअंदाजी पर कड़ी नाराजगी जताई जा चुकी है। सार्वजनिक बैठकों में यह स्पष्ट किया गया था कि निर्वाचित प्रतिनिधि स्वयं जिम्मेदारी निभाएंगे, किसी रिश्तेदार को अधिकार नहीं दिए जा सकते। ऐसे में अब पंचायत स्तर पर यदि ‘सरपंच पति’ खुलकर निर्वाचित प्रतिनिधि की भूमिका निभाते दिखाई दें, तो यह प्रशासन के लिए भी गंभीर चिंता का विषय होना चाहिए।सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि सरकारी शिविर में ही सरपंच की कुर्सी पर पति बैठेंगे, तो आम ग्रामीण कैसे पहचान करेंगे कि वास्तविक सरपंच कौन है? जनता किससे जवाब मांगे और किसे अपना निर्वाचित प्रतिनिधि माने?
यह स्थिति भ्रम पैदा करने के साथ-साथ लोकतांत्रिक जवाबदेही को भी कमजोर करती है।देश के विभिन्न राज्यों में समय-समय पर ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां निर्वाचित महिला सरपंच के नाम पर उनके पति या अन्य परिजन पूरे पंचायत कार्यों का संचालन करते रहे। कई मामलों में जांच एजेंसियों ने वित्तीय अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के आरोपों की भी जांच की है। हालांकि प्रत्येक मामले के तथ्य अलग-अलग होते हैं, इसलिए किसी विशेष पंचायत पर बिना जांच ऐसे आरोप नहीं लगाए जा सकते। लेकिन यह अनुभव बताता है कि निर्वाचित प्रतिनिधि के स्थान पर अनधिकृत हस्तक्षेप पारदर्शिता और जवाबदेही को प्रभावित कर सकता है अब आवश्यकता इस बात की है कि जिला प्रशासन इस पूरे मामले का संज्ञान ले।
यदि वास्तव में निर्वाचित महिला सरपंच की जगह उनके पति सरकारी कार्यक्रमों में अधिकारपूर्वक बैठकर कार्य कर रहे हैं, तो संबंधित अधिकारियों को तथ्यात्मक जांच कर आवश्यक कार्रवाई करनी चाहिए। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि पंचायतों में केवल निर्वाचित प्रतिनिधि ही अपने अधिकारों का प्रयोग करें और महिला आरक्षण की भावना का किसी भी स्तर पर उल्लंघन न हो।जन-विश्वास अभियान का उद्देश्य शासन और जनता के बीच विश्वास को मजबूत करना है। ऐसे में यदि सरकारी मंचों पर ही निर्वाचित प्रतिनिधियों के स्थान पर उनके परिजन बैठेंगे, तो यह अभियान की मंशा पर भी सवाल खड़े करेगा। अब सबकी निगाहें ग्वालियर कलेक्टर पर हैं कि वे इस मामले में क्या रुख अपनाते हैं और पंचायत व्यवस्था की गरिमा बनाए रखने के लिए क्या कदम उठाते हैं।

















